गोल गोल ढुङ्ग

 

पहाड़ों की

अपणी कुड़ी

ईज'क प्रेम'म

चुपड़ी रवट व

जर्जर हाथों'ल

थप थपुण

अपण खेत, जंगव व

पहाड़ दगड

अटखेलि में

बित'णी जीवन....

कब गोल गोल

ढुङ्ग बन गईं

नि पत लाग |

ढुङ्ग बण बेर

पहाड़ बटी घुरिने

नौकरि ढूंढ़ने

शहर क एक

ढाब में आ अटक्यूँ

कतु दिन तलक

शहर क सड़क, गलि में

घर क लिजि भटक्यूँ ||

एक मौहल्ल'म

एक कमर मिलो

जेके मिल घर क

घर'क दीवार

म्यर दगड़ी

जे'क दगड

दुख सुख बांटी

कभड़ी कभड़ी डाण मारी |

पहाड़ बटि जब घुरि'ण छि

शहर'क लीजि'क मचल'ण छि

ठुल ठुल स्वैण देख'ण छि

तब नि सोचि

पेटे'की भुख व

रोटि कि तलाश

म्यर आजाद,अल्हड़ जीवन कें

कोई  ढाबे कि

जी हजुरी करण'म

कमरे कि दीवाल'म

उलझी बेर

रे जालि |

 

पुष्पा रति