अपने साथ लाए वो तुम्हें भी
डोली में बैठाकर या कंडी में सजाकर
और तुम भी चल दिए होंगे।
सुना है तुम पहनते हो कानों में घंटियां
कांसे की बड़ी बड़ी घंटियां जो बजती है
तुम्हें पसंद नहीं किसी और का नाम
जपते हो निरंतर शिव को
पीढ़ियों तक बैठे रहे घर के किसी कोने पर
हर सुख दुख में होता था तुम्हारा स्मरण
तुम तो अदृश्य थे न कोई प्रतिमा न कोई विग्रह
बस पूजे जाते थे घर के किसी कोने में
अब उन्होंने कर दिया है तुम्हें अपने से दूर
बनाकर तेरी प्रतिमा बैठा दिया है ऊंचे थान पर
पर अब वो भूल से गये है तुमको भी
यदा कदा आ जाते हैं भूले बिसरे
पर तू फिर भी प्रसन्न हैं
तुम तब भी घंटियां पहनते थे
और आज भी घंटियां पहनते हो।
धीरज गुसाईं

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